महज आधा प्रतिशत शिकायतों पर ही होती है जीडीए में कार्रवाईबाबू और अधिकारियों की फाइलों में सालों साल दबी रहती हैं शिकायत

100 बात की एक बात
गाजियाबाद विकास प्राधिकरण जीडीए के गठन के बाद से अब तक बहुत ज्यादा बदलाव आ गए हैं। जीडीए का गठन शहर के योजनाबद्ध विकास के लिए किया गया था, लेकिन अब जीडीए अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है। केवल शहर ही नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी अवैध और बिना नक्शा पास करवाए बड़े स्तर पर निर्माण कार्य हो रहे हैं। इन अवैध निर्माण की शिकायतें भी जीडीए अधिकारियों से लगातार की जाती हैं, लेकिन जीडीए अधिकारियों के कानों और आंखों पर भ्रष्टाचार की इतनी मोटी पट्टी बंधी है कि उन्हें न तो वह शिकायत सुनाई देती है और न ही दिखाई देती है। बात केवल बाबू, जेई और एई तक भी होती तो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन मामला तो जीडीए वीसी तक एक जैसा है। जीडीए अधिकारी पहले तो शिकायतों को दबाकर रखते हैं। शिकायत जीडीए वीसी तक पहुंच ही नहीं पाती। यदि कोई शिकायत जीडीए वीसी तक पहुंच भी जाए तो अधिकारी अवैध निर्माण को वैध बनाने में जुट जाते हैं। जब तक शिकायत के आधार पर कार्रवाई का आदेश होता है तब तक तो अवैध निर्माण पूरा हो जाता है और उसमें रिहायश तक हो जाती है। जिसके बाद उस अवैध निर्माण को ध्वस्त करना जीडीए के बस की बात नहीं रहती। लिहाजा अवैध निर्माण को कुछ ले-देकर वैध घोषित कर दिया जाता है। एक अनुमान के आधार पर जीडीए में पहुंचने वाली शिकायतों में से केवल आधा प्रतिशत शिकायतों पर ही कार्रवाई होती है जबकि 99.05 प्रतिशत शिकायतें बाबू और अधिकारियों की फाइलों में ही दबी रहती हैं. जब तक शिकायत उनकी फाइल से बाहर आती है तब तो पूरा सीन ही बदल चुका होता है। कहा भी जाता है कि जीडीए भ्रष्टाचार की गर्त तक पहुंच चुका है। गंभीर बात तो यह भी है कि शासन को भी इसकी जानकारी है, लेकिन फिर भी जीडीए के भ्रष्टाचार और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। यदि सरकार जीडीए में तैनात बाबू और अधिकारियों की संपत्ति की ही जांच कर ले तो पता चल जाए कि कौन भ्रष्टाचार में कितना गहरा डूबा हुआ है। जीडीए के एक-एक बाबू के पास करोड़ों रुपए की संपत्ति है। केवल इतना ही नहीं जीडीए में तैनात चपरासी और अर्दली तक लखपति तो हैं ही। बिल्डर के अवैध निर्माण को भी अधिकारी नजरअंदाज कर देते हैं। यदि कोई मामला कोर्ट ही पहुंच जाए तब उस पर कुछ ध्यान दिया जाता है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति ही की जाती है। एक शिकायत सालों साल अटकी रहती है। हां, यदि बात उगाही की हो तो जीडीए के बाबू से लेकर अधिकारी तक सभी एक जुट होकर मौके पर पहुंच जाते हैं। उगाही भी कई तरह से होती है। कोई अपने ही भवन में कुछ मरम्मत का कार्य कर रहा तब भी जीडीए के कर्मचारी मौके पर पहुंच जाते हैं। फिर वह निर्माण जीडीए के क्षेत्र में आता हो या नहीं। जीडीए में आने वाले शीर्ष अधिकारी तैनाती के बाद बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद खातिरदारी होते ही अपने दावे और वादे भूल जाते हैं। 100 बात की एक बात यह है कि जीडीए अधिकारियों की सीबीआई, ईडी जैसी संस्थाओं से जांच करवाई जानी चाहिए। इसके साथ ही जीडीए में पहुंचने वाली शिकायतों का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए। जिससे जनता को भी पता रहे कि किस शिकायत पर क्या काम हो रहा है। यदि काम नहीं हो रहा है तो क्यों नहीं हो रहा है। क्योंकि कई मामले तो ऐसे भी हैं, जिनमें पीड़ित सालों साल लगातार शिकायत करता रहता है, लेकिन कार्रवाई होती ही नहीं है। कार्रवाई की बात तो दूर शिकायत या तो अधिकारी की फाइल में दबी रहती है या फिर उसे डस्टबीन का रास्ता दिखा दिया जाता है। भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस केवल हवाई दावे हैं, जबकि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई रीति या नीति ही नहीं है।