निचली अदालत ने इलियास को सुनाई थी आजीवन कारावास की सजा
हाईकोर्ट ने आरोपी के कबूलनामे को साक्ष्य मानने से किया इनकार
बम धमाके का एक आरोपी 2013 में निचली अदालत से हो गया था बरी
सूर्या बुलेटिन
गाजियाबाद। मोदीनगर में 1996 में बस में हुए बम धमाके के मामले में प्रयागराज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे मोहम्मद इलियास को बरी कर दिया है। जबकि इस मामले में पूर्व में भी एक आरोपी को निचली अदालत ने बरी कर दिया था। निचली अदालत ने दो आरोपियों को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उनमें एक दोषी मोहम्मद इलियास ने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। अदालत ने मंगलवार को दिए फैसले में मोहम्मद इलियास को दोषमुक्त करार देते हुए बरी कर दिया है। इस बम धमाके में बस में सवार 18 लोगों की मौत हो गई थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह कहते हुए भारी मन से बरी कर दिया कि पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा अस्वीकार्य है। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ब्लास्ट में शामिल होने का सबूत नहीं जुटा सका। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की डिवीजन बेंच ने यह आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने अपने 51 पेज के फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में विफल रहा और पुलिस द्वारा दर्ज इकबालिया बयान साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत प्रतिबंध के मद्देनजर अस्वीकार्य है। इलियास की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता के खिलाफ कानूनी रूप से स्वीकार्य कोई साक्ष्य नहीं बचा है। इसलिए वह ‘भारी मन से’ बरी करने का आदेश पारित कर रही है। घटना में 18 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी।
–ये है पूरा मामला
मामले को लेकर की गई एफआईआर के अनुसार रुड़की डिपो की बस 27 अप्रैल 1996 की दोपहर 3:55 बजे लगभग 53 यात्रियों को लेकर दिल्ली से रवाना हुई थी। मोहननगर में 14 और यात्री इसमें सवार हुए थे। शाम करीब पांच बजे बस के अगले हिस्से में शक्तिशाली विस्फोट हुआ और 10 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि लगभग 48 यात्री विस्फोट में घायल हुए। पोस्टमार्टम में शवों में धातु के टुकड़े पाए गए। डॉक्टरों ने बताया कि मौत बम विस्फोट के बाद अत्यधिक रक्तस्राव के चलते हुई। फोरेंसिक जांच में ड्राइवर की सीट के नीचे कार्बन मिला आरडीएक्स रखे जाने की पुष्टि भी हुई थी। विस्फोट रिमोट स्विच के जरिए किया गया था। अभियोजन का आरोप था हमले को पाकिस्तानी नागरिक और हरकत-उल-अंसार के कथित जिला कमांडर अब्दुल मतीन उर्फ इकबाल ने मोहम्मद इलियास और तस्लीम के साथ मिलकर अंजाम दिया था।
-गवाह नहीं पहचान सके
मूल रूप से मुजफ्फरपुर निवासी लेकिन लुधियाना में रहने वाले मोहम्मद इलियास को जम्मू-कश्मीर के आतंकवादियों ने भड़काया था। वर्ष 2013 में निचली अदालत ने सह अभियुक्त तस्लीम को बरी कर दिया, लेकिन इलियास और अब्दुल मतीन को विभिन्न धाराओं में आजीवन कारावास के साथ-साथ कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। तस्लीम को बरी किए जाने के खिलाफ सरकार ने कोई अपील दायर नहीं की। हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य मुद्दा इलियास के इकबालिया बयान की स्वीकार्यता था। पुलिस का दावा था कि जून 1997 में लुधियाना में गिरफ्तारी के बाद उसने पिता और भाई की मौजूदगी में बम लगाने की बात कबूल की थी। बयान सीबीसीआईडी के सेक्टर अधिकारी, विवेचना अधिकारी ने ऑडियो कैसेट पर रिकॉर्ड किया था। हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन ने कुल 34 गवाहों को परीक्षित कराया था। यात्रियों और प्रत्यक्षदर्शियों ने घटना को साबित कर दिया, लेकिन कोई भी यह नहीं पहचान सका कि विस्फोटक किसने लगाया था।
–टाडा अधिनियम का मामला नहीं
दरअसल, बस के आईएसबीटी दिल्ली से रवाना होने से पहले बम रखा गया था, जिससे पहचान असंभव हो गई। खंडपीठ ने अभियोजन पक्ष के इस तर्क को खारिज कर दिया कि टाडा अधिनियम की धारा 15 के तहत, पुलिस अधीक्षक के पद से नीचे के पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान स्वीकार्य है। हाईकोर्ट ने कहा, विस्फोट अप्रैल 1996 में हुआ था, जब टाडा लागू नहीं था और इस प्रकार टाडा में प्रदत्त विशेष अपवाद (जो पुलिस के इकबालिया बयानों को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने की अनुमति देता था), मामले में लागू नहीं होता। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस टेप रिकॉर्डर में कथित तौर पर बयान दर्ज किया गया था, उसे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया था।



