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100 बात की एक बात आखिर “झोला छाप” ही काम आए।

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आखिर झोला छाप ही काम आए

सूर्या बुलेटिन(गाजियाबाद) महामारी के इस काल में जब डॉक्टरों की सबसे अधिक आवश्यकता थी उसी समय मरीजों को डॉक्टर नहीं मिल पा रहे है।वास्तव में यह महामारी किसी ग्रह युद्ध से कम नहीं है।जब कोई भी व्यक्ति बीमार होता है तो वह डॉक्टर के पास दौड़ता है लेकिन ये वो वक्त है जब ना तो हॉस्पिटल मे बेड है और ना ही डॉक्टर है।ज्यादा तर हॉस्पिटल में वार्ड बॉय व अंडर ट्रेनिग डॉक्टर ही काम चला रहे है।जबकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि इस बात पता लगाया जाय की जिन्होंने एम बी बी एस पूरा किया है,उन डॉक्टर का कैसे बेहतर तरीके से उपयोग किया जाए।जिनकी संख्या कोर्ट ने 1.5 लाख बताई है।इसके बावजूद हमारा सिस्टम पूरी तरह से कोलेप्स दिख रहा है। सौ बात की एक बात ये कि जिन डॉक्टरों ने अच्छे समय में बहुत अच्छा पैसा कमाया और भगवान का दर्जा मुफ्त में आज उन्होंने अपनी क्लीनिक व ओ पी डी बंद कर पिछले बीस दिनों से आइसुलेसन के नाम पर घर में ही लेट रहे है, जबकि मरीज को भी केवल 14 दिनों के लिए कॉर्नटायन किया जाता है।अब ऐसी मुसीबत के समय मरीज तथाकथित भगवान को कहां ढूढें,आखिर गली महोल्ले के डॉक्टर जिन्हें हम झोला छाप पुकारा करते थे वहीं काम आए।इन्हीं की बदौलत कस्बा व ग्रामीण क्षेत्र की जनता रुकी हुई है।क्योंकि कोविड के अलावा भी बहुत सी सीजनली बीमारी है जिन्हें हम कोविड़ समझ कर डर से ही मर जाते है।ऐसे में हमें इन लोगो को धन्यवाद देना चाहिए कि वो अपने बच्चो की परवाह करे बिन आपको सेवा दे रहे है।

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