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शिक्षा के अधिकार की नींव रखने वाले गोपाल कृष्ण गोखले, जिन्होंने सदन से वाक आउट करना सिखाया

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सूर्या बुलेटिन : महात्मा गाँधी को देश लौटते ही उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने भारत को जानने के लिए उसकी तलाश करने की सलाह दी थी। यह सबक गाँधी जी ने अपने जीवन के अंतिम समय तक याद रखा और अपने हर अभियान से पहले भारत के कोने-कोने के लोगों तक पहुँचकर उनको एकजुट करने के प्रयास किए।

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 1857 की क्रांति के नौ साल बाद मई 09, 1866 को रत्नागिरी जिले के कोटलुक गाँव में हुआ था। यह आज महाराष्ट्र राज्य का हिस्सा है।

गोखले के राजनीतिक दर्शन, उनकी विचारधारा का ही प्रभाव था कि महात्मा गाँधी ही नहीं बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना ने भी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु कहा था। हालाँकि, यह बात और है कि एक बेहद विनम्र और उदारवादी गोखले का शिष्य जिन्ना जहाँ अपने राजनीतिक जीवन के शुरूआती दौर में उदारवादी रहा, वही अंत में कट्टर इस्लामिक चरमपंथी बनकर उभरा।

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में गोखले की भूमिका ऐसी है कि उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के ही नीचे रहकर एक ऐसे भारत का निर्माण किया जो विवेकशील तो था ही, साथ ही उसके भीतर एक उन्नत भविष्य की नींव रखने का सपना भी पलता रहा।

भारत की उन्नति के लिए ब्रिटिश हुकूमत की जरूरत

स्वयं गोपाल कृष्ण गोखले का यह विचार था कि भारत जितनी तरक्की अंग्रेज़ी साम्राज्य में रहकर कर सकता है उतनी उसके बिना सम्भव नहीं। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं था कि गोखले भारत से प्रेम नहीं करते थे। गोखले का मानना था कि भारतीयों को पहले शिक्षित होने की आवश्यकता है, तभी वह नागरिक के तौर पर अपना हक यानी आजादी हासिल कर पाएँगे। गोखले किसी भी राष्ट्र की तरक्की के लिए शिक्षा के महत्व को बखूबी समझते थे।

यह महज कोरी बातें नहीं थीं। गोखले ने शिक्षा और भारत के वैचारिक जागरण के लिए ऐसे कई प्रयास किए थे, जिनमें से प्रारंभिक शिक्षा को मूलभूत अधिकार बनाने का विचार सबसे प्रमुख है। उनकी सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटीने शिक्षा के प्रसार के लिए स्कूल बनवाए। रात में पढ़ाई के लिए फ्री-क्लासें लीं और एक मोबाइल लाइब्रेरी की भी व्यवस्था की।

देश सेवा के लिए राष्ट्रीय प्रचारकों को तैयार करने के उद्देश्य से गोखले ने 12 जून 1905 को इसी ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ यानी ‘भारत सेवक समिति’ की स्थापना की। इस संस्था से पैदा होने वाले महत्वपूर्ण समाज सेवकों में वी श्रीनिवास शास्त्री, जीके देवधर, एनएम जोशी, पंडित हृदय नारायण कुंजरू आदि थे।

शिक्षा का अधिकार कानून

गोखले ने अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का अपना फॉर्मूला वर्ष 1910 में ‘प्राथमिक शिक्षा बिल’ के रूप में रखा था। उस समय गोखले ने इसके पक्ष में ढेरों तर्क दिए लेकिन तमाम दलीलों के आगे एक सत्य भारी था कि जब औपनिवेशिक सरकार को इस तरह के किसी फैसले से कोई आर्थिक फायदा ही नहीं हो रहा था तो आखिर वो ऐसा क्यों करते?

यही कारण था कि उस समय यह बिल पास नहीं हो सका। लेकिन एक शताब्दी बाद यही बिल देश की जनता के सामने शिक्षा का अधिकार के रूप में आ सका। गोखले के दूरदर्शी व्यक्तित्व की झलक उसी एक बिल में नजर आती है। गोखले का वह कदम भारत में शिक्षा के अधिकार की नींव थी।

तिलक और गोखले

वास्तव में, गोखले उदारवादी होने के साथ-साथ सच्चे राष्ट्रवादी भी थे। लेकिन उग्र दल से कभी उनके विचार मेल नहीं बैठा पाए। यही वजह थी कि एक समय सहपाठी रहने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के साथ उनके रास्ते स्वाधीनता की लड़ाई में बिछड़ने लगे। गोखले इतिहास के उस पल के साक्षी भी बने जब कॉन्ग्रेस में पहली बार वर्ष 1907 में जूते-चप्पल और लाठियाँ चलने के बाद विभाजन हुआ। यही वो समय भी था जिसके बाद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का दूसरा चर्चित मुकदमा कायम हुआ।

राजनीतिक कारणों से विरोधी बने गोखले और तिलक के विरोध दुर्भाय्ग्वश गोखले की मृत्यु के बाद ही दूर हो सके। वैचारिक विरोधी और उग्र दल के नेता तिलक ने गोखले की मौत पर उनके सम्मान में जो कहा था, वह राजनीति के हर उस काल में एक सबक है, जब सत्ताएँ आपसी संघर्ष और विचारधारा के द्वन्द में पतनशील मार्ग को अपनाती हैं। बाल गंगाधर तिलक ने गोखले की चिता को देखते हुए कहा था कि ये भारत का रत्न सो रहा है और देशवासियों को जीवन में इनका अनुकरण करना चाहिए।

देखा जाए तो गोपाल कृष्ण गोखले को जिन कुछ कारणों के लिए हमेशा याद किया जाना चाहिए उनमें सबसे अहम हिंदू-मुस्लिम संबंध, दलितों के अधिकार, महिलाओं के अधिकारों का समर्थन, गुणवत्तापूर्ण और अनिवार्य शिक्षा की वकालत और राष्ट्र प्रेम की भावना।

गोखले हमेशा इस पक्ष में रहे कि अंग्रेजी हुकूमत को भारत की उन्नति के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए और इसके लिए उन्होंने स्वाधीनता की लड़ाई से ज्यादा वैचारिक लड़ाई को महत्व दिया। उस दौर में गरम दल के लोग उन्हें ‘दुर्बल हृदय का उदारवादी एवं छिपा हुआ राजद्रोही’ तक कहा करते थे।

जबकि हकीकत यह थी कि गोखले ने भारत के लिए काउंसिल ऑफ़ द सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेटऔर नाइटहुडकी उपाधि ग्रहण करने से भी मना कर दिया था। कहा जाता है कि उन्होंने ऐसा निम्न जाति के हिन्दुओं की शिक्षा और रोज़गार में सुधार की माँग के लिए किया था।

गाँधी के गुरु होने के साथ ही गोखले खुद महादेव गोविंद रानाडे के शिष्य रहे। गोपाल कृष्ण गोखले को वित्तीय मामलों की अद्वितीय समझ और उस पर अधिकारपूर्वक बहस करने की क्षमता के कारण उन्हें ‘भारत का ग्लेडस्टोन’ कहा जाता है।

संसद से पहला वाक आउट

एक समय जब अंग्रेजों द्वारा किसानों से भूमि अधिकार छीनने के लिए बिल रखा गया और ब्रिटिश सरकार इसे बहुमत के बल पर पास करने पर भी अड़ी रही। इस बिल पर चर्चा के विरोध में फिरोजशाह मेहता और गोखले ने इस बिल की कड़ी आलोचना करते हुए सदन से वॉकआउट किया। यह इस प्रकार की पहली घटना थी। ऐसा उससे पहले कभी नहीं हुआ था। गोखले और उनके सहयोगियों के इस फैसले ने औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार की खूब फजीहत हुई थी, क्योंकि यह उनका प्रत्यक्ष तिरस्कार था।

भारतीय संसद में उनकी बहस और तर्क इतने प्रभावशाली होते थे कि एक समय ऐसा भी था जब बजट भाषण पर गोखले की आलोचना पढ़ने के लिए लोग टाइम्स ऑफ इंडियाके मुंबई ऑफिस के बाहर लाइन लगाया करते थे। उस समय टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का दफ्तर अंग्रेज अधिकारियों द्वारा ही चलाया जाता था।

वायसराय की काउंसिल में रहते हुए गोपाल कृष्ण गोखले ने किसानों की स्थिति की ओर अनेक बार ध्यान दिलाया। वे संवैधानिक सुधारों के लिए निरंतर ज़ोर देते रहे। ऐतिहासिक ‘मिंटो-मार्ले सुधारों’ का बहुत कुछ श्रेय गोखले के प्रत्यनों को जाता है।

नवम्बर 27, 1912 –विक्टोरिया गार्डन, जांजीबार में महात्मा गाँधी और गोखले

गोखले को डायबिटीज और कार्डिएक अस्थमा की शिकायत थी। व्यस्त जीवनशैली और तमाम बीमारियों के कारंगोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु बेहद अल्पायु में हो गई और फरवरी 19, 1915 को मात्र 49 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया।

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